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चंद्र कुमार श्रीवास्तव

नई दिल्ली I मंगलवार I 31 मार्च 2026

आज का वैश्विक परिदृश्य एक विचित्र विडम्बना को उजागर करता है—जहाँ धर्म, जो मूलतः मनुष्य को जोड़ने का माध्यम था, वही अनेक बार विभाजन और संघर्ष का कारण बनता दिखाई देता है। हाल के समय में कुछ राजनीतिक वक्तव्यों और अंतरराष्ट्रीय तनावों को “धर्मयुद्ध” का नाम दिया जा रहा है, जिससे यह भ्रम और गहरा होता है कि विश्व में चल रहे संघर्ष वास्तव में धर्मों के बीच हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प जैसे नेताओं द्वारा प्रयुक्त भाषा, चाहे वह रणनीतिक हो या वैचारिक, जनमानस को प्रभावित करती है। जब युद्ध को “ईश्वर” या “धर्म” के नाम पर परिभाषित किया जाता है, तब वह केवल एक राजनीतिक या भू-राजनीतिक संघर्ष नहीं रह जाता, बल्कि वह भावनाओं और आस्थाओं का मुद्दा बन जाता है। यही वह बिंदु है, जहाँ विवेक धुंधला पड़ने लगता है।
वास्तविकता यह है कि ईसाई धर्म और इस्लाम—दोनों ही एक ही आध्यात्मिक परंपरा, अर्थात् अब्राहमिक धारा से उत्पन्न हुए हैं। दोनों ही इब्राहीम को अपनी आस्था का आधार मानते हैं। एक उन्हें “अब्राहम” कहता है, दूसरा “इब्राहीम”—परंतु यह केवल भाषा और परंपरा का अंतर है, मूल तत्व का नहीं। दोनों धर्म एक ईश्वर (एकेश्वरवाद )में विश्वास रखते हैं, नैतिकता, करुणा और न्याय को महत्व देते हैं।
फिर प्रश्न उठता है—यदि मूल एक है, तो विभाजन क्यों?
इसका उत्तर धर्म में नहीं, बल्कि मनुष्य की व्याख्या और उसके स्वार्थ में छिपा है। इतिहास साक्षी है कि सत्ता, संसाधनों और प्रभुत्व की होड़ ने अनेक बार धर्म को एक उपकरण के रूप में उपयोग किया है। धर्म, जो आत्मा की शांति का मार्ग था, उसे पहचान और वर्चस्व की राजनीति का साधन बना दिया गया। परिणामस्वरूप, संघर्ष का स्वरूप बदल गया—वह आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हो गया।
यीशु मसीह ने प्रेम और क्षमा का संदेश दिया, और इस्लाम में भी करुणा (रहमत) को अत्यंत महत्व दिया गया है। यदि इन दोनों धर्मों के मूल उपदेशों को देखा जाए, तो वे एक-दूसरे के विरोध में नहीं, बल्कि पूरक प्रतीत होते हैं। फिर भी, जब इन शिक्षाओं की जगह संकीर्ण व्याख्याएँ ले लेती हैं, तब संघर्ष अनिवार्य हो जाता है।
यह समझना आवश्यक है कि आज का युद्ध “धर्मों का युद्ध” नहीं, बल्कि “दृष्टिकोणों का संघर्ष” है—एक ओर वह दृष्टि जो मनुष्य को विभाजित करती है, और दूसरी ओर वह जो उसे एकता में देखती है। जब हम अपनी पहचान को धर्म, जाति या राष्ट्र तक सीमित कर देते हैं, तब हम अपने व्यापक मानव स्वरूप को भूल जाते हैं।
समाधान किसी एक धर्म की विजय में नहीं, बल्कि इस बोध में है कि सभी मनुष्य एक ही स्रोत की संतान हैं। यह बोध केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि आत्मिक होना चाहिए। जब तक यह परिवर्तन भीतर नहीं आएगा, तब तक बाहरी शांति केवल एक क्षणिक भ्रम बनी रहेगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम धर्म को उसके मूल स्वरूप में समझें—एक मार्ग के रूप में, न कि एक हथियार के रूप में। जब धर्म मनुष्य को जोड़ने लगेगा, तब ही विश्व में स्थायी शांति की संभावना साकार होगी। अन्यथा, “इब्राहीम” और “अब्राहम” के नाम भले ही अलग हों, परन्तु उनके अनुयायी एक ही पीड़ा को बार-बार जीते रहेंगे।

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